अमेरिका–भारत व्यापार समझौता: आर्थिक विकास, व्यापार, श्रम और कृषि के लिए खतरा
हालिया अमेरिका–भारत व्यापार समझौते ने देश के आर्थिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह समझौता न केवल असमान टैरिफ संरचना पर आधारित है, बल्कि इससे भारत की आत्मनिर्भरता, व्यापारिक विकास, श्रमिकों की सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
आर्थिक विकास पर संकट
भारत की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र हैं। अमेरिकी उत्पादों को 0% टैरिफ पर भारत में प्रवेश देने से घरेलू उत्पादन कमजोर होगा।
- आयात पर निर्भरता बढ़ेगी।
- व्यापार घाटा गहराएगा।
- विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ेगा।
यह स्थिति दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को कमजोर करेगी और "विकसित भारत" का सपना अधूरा रह जाएगा।
व्यापारिक विकास पर असर
व्यापारिक विकास तभी संभव है जब घरेलू उद्योगों को सुरक्षित और प्रतिस्पर्धी वातावरण मिले।
- अमेरिकी उत्पादों के लिए शून्य टैरिफ का मतलब है कि भारतीय कंपनियाँ अपने ही देश में अमेरिकी उत्पादों से हार जाएँगी।
- भारतीय निर्यातकों को अमेरिका में 18% टैरिफ देना होगा, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता घटेगी।
- छोटे और मध्यम उद्योग (SMEs) पर सबसे बड़ा दबाव पड़ेगा।
यह समझौता भारत के व्यापारिक विकास को रोक देगा और विदेशी कंपनियों का दबदबा बढ़ाएगा।
श्रमिकों पर सीधा असर
जब घरेलू उद्योग और कृषि अमेरिकी आयात के दबाव में कमजोर होंगे, तो इसका सीधा असर श्रमिकों पर पड़ेगा।
- रोजगार के अवसर घटेंगे।
- मजदूरी और श्रमिक सुरक्षा कमजोर होगी।
- बेरोजगारी और पलायन बढ़ेगा।
यह स्थिति भारत के युवाओं को और अधिक असुरक्षित बनाएगी, जो पहले से ही रोजगार संकट और विदेशों में डिपोर्टेशन जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
कृषि पर हमला
भारत की 60% आबादी कृषि पर निर्भर है। अमेरिकी कृषि उत्पादों का आयात किसानों की आजीविका पर सीधा खतरा है।
- कपास, सोयाबीन, ड्राई फ्रूट और अन्य उत्पादों का आयात कई गुना बढ़ गया है।
- GM फसलों और अमेरिकी डेयरी उत्पादों का प्रवेश भारत की जैव-सुरक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रभावित करेगा।
- किसानों के उत्पादों की कीमतें गिरेंगी और उनकी आय घटेगी।
यह समझौता किसानों के हितों से किया गया गंभीर विश्वासघात है।
अमेरिका–भारत व्यापार समझौता केवल व्यापार का मामला नहीं है। यह भारत की आर्थिक वृद्धि, व्यापारिक विकास, श्रमिकों की सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर सीधा हमला है।
- आर्थिक विकास कमजोर होगा।
- व्यापारिक विकास रुक जाएगा।
- श्रमिकों के रोजगार पर संकट आएगा।
- किसानों की आजीविका खतरे में पड़ेगी।
भारत को चाहिए कि इस समझौते की पूरी शर्तें संसद और जनता के सामने रखी जाएँ और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाए।

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