🇮🇳 भारत में ईंधन कर व्यवस्था: संगठित लूट की कहानी
By : Parminder Singh bhamba
भारत में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के उतार-चढ़ाव पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि इस बात पर भी कि सरकार और तेल कंपनियाँ इनकी कीमतें कैसे तय करती हैं। पिछले दस वर्षों में ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ी हैं, और आम जनता को राहत नहीं मिली। विशेषज्ञ इसे “संगठित लूट” कहते हैं — एक ऐसी व्यवस्था जिसमें सरकार और कंपनियाँ हमेशा लाभ में रहती हैं, जबकि जनता को नुकसान उठाना पड़ता है।
भारत लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। रिफाइनरी में तैयार होने के बाद पेट्रोल या डीज़ल की मूल लागत लगभग ₹35–45 प्रति लीटर होती है। इसके ऊपर केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क लगाती है — वर्तमान में पेट्रोल पर ₹13 और डीज़ल पर ₹10 प्रति लीटर। राज्य सरकारें वैट लगाती हैं, जो 7% से लेकर 31% तक हो सकता है। इसके अलावा डीलर कमीशन और परिवहन लागत भी जुड़ती है। इस तरह, जब उपभोक्ता पेट्रोल पंप पर भुगतान करता है, तो कीमत का लगभग 55% हिस्सा टैक्स होता है।
2014 में जब कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल थी, तब दिल्ली में पेट्रोल ₹61 और डीज़ल ₹46 प्रति लीटर था। 2016 में तेल की कीमत $40 तक गिर गई, लेकिन सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया, जिससे जनता को राहत नहीं मिली। 2018 में पेट्रोल ₹80 और डीज़ल ₹72 तक पहुँच गया। 2020 में कोविड महामारी के दौरान तेल फिर सस्ता हुआ, लेकिन टैक्स बढ़ा दिया गया। 2021 में पेट्रोल ₹112 और डीज़ल ₹98 तक पहुँच गया — यह अब तक का सबसे ऊँचा स्तर था। 2023–24 में कीमतें थोड़ी स्थिर हुईं, लेकिन टैक्स का बोझ बरकरार रहा।
सरकार और तेल कंपनियाँ इस व्यवस्था में हमेशा लाभ में रहती हैं। ईंधन कर से सरकार को हर साल ₹4–5 लाख करोड़ की आय होती है। तेल कंपनियाँ भी अपने मार्जिन सुरक्षित रखती हैं और घाटा शायद ही कभी उठाती हैं। लेकिन आम जनता को हर बार नुकसान होता है — ऊँची कीमतें, बढ़ती महँगाई और परिवहन लागत का असर रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ता है।
अगर पेट्रोल और डीज़ल को GST के दायरे में लाया जाए, तो स्थिति पूरी तरह बदल सकती है। 28% GST दर पर पेट्रोल ₹67–70 और डीज़ल ₹65–68 प्रति लीटर तक सस्ता हो सकता है। टैक्स का हिस्सा 55% से घटकर 28% रह जाएगा। इससे उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी और महँगाई पर नियंत्रण होगा। लेकिन सरकारें ऐसा नहीं करतीं क्योंकि इससे उनकी आय में भारी कमी आएगी और राज्यों की टैक्स स्वतंत्रता घटेगी।
सरकार इसे “राष्ट्र निर्माण के लिए राजस्व” कहती है, लेकिन जनता के लिए यह दोहरी मार है — एक बार पेट्रोल पंप पर और दूसरी बार महँगाई के रूप में। पिछले दशक में भारत की ईंधन कर व्यवस्था एक असंतुलित प्रणाली बन गई है, जिसमें सरकार और कंपनियाँ लाभ में हैं और जनता लगातार नुकसान में। जब तक संरचनात्मक सुधार नहीं होता, यह “संगठित लूट” जारी रहेगी।

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