Skip to main content

अमेरिका और तेल की राजनीति



अमेरिका और तेल की राजनीति


कई सालों से अमेरिका की विदेश नीति तेल से जुड़ी रही है। बाहर से यह बात लोकतंत्र, आज़ादी और मानव अधिकारों की लगती है, लेकिन असल में इसमें तेल और ताक़त का खेल छुपा होता है। जिन देशों के पास तेल के बड़े भंडार हैं, वहाँ अमेरिका ने बार‑बार दखल दिया है और हालात बिगाड़े हैं।  


इराक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला किया, यह कहकर कि वहाँ खतरनाक हथियार हैं। बाद में पता चला कि ऐसे हथियार थे ही नहीं। लेकिन इराक के तेल के कुएँ विदेशी कंपनियों के हाथ में चले गए और देश में हिंसा और बर्बादी फैल गई।  


लीबिया में भी यही हुआ। गद्दाफी के समय लीबिया अफ्रीका का सबसे विकसित देश था। गद्दाफी ने सोने पर आधारित अफ्रीकी मुद्रा बनाने की योजना बनाई थी, जिससे अमेरिका का तेल‑डॉलर सिस्टम कमजोर हो सकता था। अमेरिका और उसके साथी देशों ने हमला किया, गद्दाफी मारे गए और लीबिया आज तक अस्थिर है।  


वेनेज़ुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं। वहाँ अमेरिका ने आर्थिक पाबंदियाँ लगाईं, नेताओं को तानाशाह कहा और सरकार बदलने की कोशिश की। नतीजा यह हुआ कि देश की अर्थव्यवस्था टूट गई और आम लोग मुश्किल में आ गए।  


असल में अमेरिका की रणनीति साफ है – तेल के रास्तों और व्यापार पर पकड़ बनाए रखना। इसके लिए वह सैन्य ठिकाने बनाता है, डॉलर में तेल का व्यापार करवाता है और जो नेता विरोध करते हैं उन्हें दुश्मन या आतंकवादी कह देता है।  


इस सबका सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को होता है। लाखों लोग बेघर हो जाते हैं, देशों की अर्थव्यवस्था गिर जाती है और समाज टूट जाता है।  


आख़िर में सच्चाई यही है कि अमेरिका की तेल की राजनीति ने कई देशों को बर्बाद किया है। लोकतंत्र और आज़ादी की बातें अक्सर सिर्फ़ दिखावा होती हैं, असल मकसद ताक़त और तेल पर कब्ज़ा करना होता है।  


Comments

Popular posts from this blog

भारत में ईंधन कर व्यवस्था: संगठित लूट की कहानी

🇮🇳 भारत में ईंधन कर व्यवस्था: संगठित लूट की कहानी By : Parminder Singh bhamba  भारत में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के उतार-चढ़ाव पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि इस बात पर भी कि सरकार और तेल कंपनियाँ इनकी कीमतें कैसे तय करती हैं। पिछले दस वर्षों में ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ी हैं, और आम जनता को राहत नहीं मिली। विशेषज्ञ इसे “संगठित लूट” कहते हैं — एक ऐसी व्यवस्था जिसमें सरकार और कंपनियाँ हमेशा लाभ में रहती हैं, जबकि जनता को नुकसान उठाना पड़ता है। भारत लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। रिफाइनरी में तैयार होने के बाद पेट्रोल या डीज़ल की मूल लागत लगभग ₹35–45 प्रति लीटर होती है। इसके ऊपर केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क लगाती है — वर्तमान में पेट्रोल पर ₹13 और डीज़ल पर ₹10 प्रति लीटर। राज्य सरकारें वैट लगाती हैं, जो 7% से लेकर 31% तक हो सकता है। इसके अलावा डीलर कमीशन और परिवहन लागत भी जुड़ती है। इस तरह, जब उपभोक्ता पेट्रोल पंप पर भुगतान करता है, तो कीमत का लगभग 55% हिस्सा टैक्स होता है। 2014 में जब कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल थी, तब दिल्ली में पेट्रोल ₹61 और डी...

अरावली जीवनरेखा है — इसे बचाना हमारी ज़िम्मेदारी

अरावली: हमारी जीवनरेखा — बचाना हमारा कर्तव्य :- परमिंदर सिंह भाम्बा  अरावली पर्वतमाला केवल पत्थरों और पहाड़ों का समूह नहीं है; यह हमारी सांसों, हमारे जल स्रोतों और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का आधार है। राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली तक फैली यह प्राचीन पर्वतमाला न केवल भौगोलिक महत्व रखती है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से अनगिनत लोगों की ज़िंदगियों से गहराई से जुड़ी हुई है। अरावली का हर पेड़, हर नाला और हर चट्टान हमारे अस्तित्व से जुड़ा है — इसलिए इसे बचाना कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य कर्तव्य है।   अरावली थार के रेगिस्तान के फैलाव को रोकने में अहम भूमिका निभाती है और आसपास की उपजाऊ भूमि को रेगिस्तानीकरण से बचाती है। इन पहाड़ियों का भूजल पुनर्भरण में बड़ा योगदान है; वर्षा का पानी यहाँ संचित होकर धीरे-धीरे जमीन में रिसता है और कई गांवों व शहरों के लिए जीवनदायिनी जल उपलब्ध कराता है। अरावली की वनस्पति और जीव-जंतु जैव विविधता के महत्वपूर्ण आवास हैं, जो कई प्रजातियों के अस्तित्व को बनाए रखते हैं। इसके जंगल वायु को शुद्ध करते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं...

मनरेगा से VB-G RAM G तक – एक लंबी अवधि का लॉलीपॉप और मजदूरों का कानूनी अधिकार खत्म

भारत सरकार द्वारा मनरेगा (MNREGA) को समाप्त कर नई योजना VB-G RAM G (Viksit Bharat – Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission Gramin) लागू करने का प्रस्ताव मजदूरों और राज्यों दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। मनरेगा केवल एक योजना नहीं थी, बल्कि ग्रामीण परिवारों के लिए कानूनी अधिकार था, जो उन्हें 100 दिन काम की गारंटी देता था और काम न मिलने पर मुआवज़ा माँगने का अधिकार भी प्रदान करता था। नई योजना में 125 दिन काम का वादा तो किया गया है, लेकिन यह केवल एक वादा है, कानूनी गारंटी नहीं । इससे मजदूरों का सबसे बड़ा सहारा छिन गया है।   राज्यों पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा क्योंकि मनरेगा में केंद्र सरकार मजदूरी का अधिकांश खर्च उठाती थी, जबकि VB-G RAM G में केंद्र का हिस्सा घटा दिया गया है और राज्यों पर अधिक वित्तीय बोझ डाल दिया गया है। पहले से ही आर्थिक दबाव झेल रहे राज्यों के लिए यह अतिरिक्त जिम्मेदारी मजदूरों को समय पर काम और भुगतान दिलाने में और मुश्किलें पैदा करेगी।   यह बदलाव केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि मनरेगा को नए नाम और नए तरीके से कमजोर किया गया है । ग्र...