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भारत की विदेश नीति और बदलता वैश्विक परिदृश्य


भारत की विदेश नीति और बदलता वैश्विक परिदृश्य

लेखक: परमिंदर सिंह भांबा



ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे अस्थिर युद्धविराम ने भारत की विदेश नीति की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। यह स्थिति केवल एक कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि उस नैतिक और रणनीतिक स्वतंत्रता की कमी का प्रतीक है, जो कभी गांधी और नेहरू की विरासत थी। आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, भारत एक मूकदर्शक बनकर किनारे खड़ा दिखाई देता है।  


पाकिस्तान, जो कभी आर्थिक दिवालियापन और आतंकवाद के समर्थन के कारण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घिरा रहता था, अब परमाणु शक्तियों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। यह परिवर्तन भारत के लिए एक चेतावनी है कि केवल आर्थिक विकास या सैन्य शक्ति से वैश्विक नेतृत्व नहीं मिलता — इसके लिए सक्रिय, संतुलित और नैतिक विदेश नीति की आवश्यकता होती है।  


भारत BRICS का अध्यक्ष होने के बावजूद, वैश्विक साझेदारी की आवाज़ बनने का अवसर खो बैठा। दिल्ली की चुप्पी को रणनीति समझ लिया गया, जबकि यह मौन भारत की भूमिका को सीमित कर गया। ईरान अपनी शर्तें तोपों के साए में तय कर रहा है, और भारत ने अमेरिका की हर ज़्यादती पर मौन साध रखा है। यह मौन आने वाले समय में महँगा पड़ सकता है।  


मोदी सरकार से गलती हुई है, लेकिन अभी भी संभलने का वक्त है। भारत को अपनी विदेश नीति में आत्मविश्वास और सक्रियता लानी होगी। हमें केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि पहल करने वाला राष्ट्र बनना होगा — जो शांति, न्याय और समानता की आवाज़ बने। यही भारत की असली पहचान है, और यही उसकी वैश्विक भूमिका होनी चाहिए।  



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